


धौलपुर 30 अक्टूबर । राजस्थान पशुचिकित्सा और पशु विज्ञान विश्वविद्यालय (जोबनेर) जयपुर द्वारा संचालित पशु विज्ञान केन्द्र, धौलपुर द्वारा “वैज्ञानिक बकरी पालन का महत्त्व एवं प्रबंधन” विषय पर एक दिवसीय पशुपालक प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया गया । केन्द्र के अधिकारी डॉ. योगेन्द्र कुमार मीणा ने पशुपालकों को बताया कि बकरी पालन उन किसानों के लिए एक बेहतरीन व्यवसायिक विकल्प है जिनके पास दैनिक मजदूरी के अलावा आय का कोई अन्य साधन नहीं है, यह नियमित आय प्रदान कर सकता है, जिससे परिवार की आजीविका आसानी से चल सकती है बकरी पालन एक ऐसा कार्य है जिसे करने के लिए बहुत अधिक संसाधन, शिक्षा और श्रम की आवश्यकता नहीं होती है, बकरी पालन एक सुलभ और व्यावहारिक उद्यम है जो ग्रामीण क्षेत्रों में आय और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद करता है। बकरी पालन में सफलता पाने और अच्छा मुनाफ़ा कमाने के लिए कुछ मुख्य बातों का ध्यान रखना बहुत ज़रूरी है। सब से पहले नस्ल का सही चुनाव करना जैसे दूध के लिए सिरोही या जमुनापारी जैसी नस्लें अच्छी हैं, जबकि मांस उत्पादन के लिए ब्लैक बंगाल जैसी नस्लें बेहतर मानी जाती हैं। डॉ. मीणा ने पशुपालकों को बताया कि बकरियों के रहने का स्थान हमेशा साफ, सूखा और हवादार होना चाहिए। नमी और गंदगी से उनमें बीमारियाँ फैल सकती हैं। सर्दी के मौसम में बकरीयों को शारीरिक भार के अनुसार दाना, गुड़, मेथी खिलाना चाहिए और विकास और उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए उनके आहार में उचित मात्रा में खनिज लवण (मिनरल मिक्स्चर) को शामिल करें। बकरियों का समय पर टीकाकरण और आंतरिक और बाहरी परजीवियों (कीड़े, जूँ आदि) के लिए हर 3 से 6 महीने में नियमित रूप से दवाइयाँ दें। बकरियों में होने वाली विभिन्न बीमारियों जैसे फडकिया, पीपीआर, खुरपका-मुंहपका, पॉक्स, पाचन संबंधी रोग, थनैला रोग आदि के कारण, लक्षण, बचाव एवं उपचार के बारे में विस्तार से जानकारी दी| उन्होंने बताया कि बकरी पालन मुख्य रूप से बकरियों के स्वास्थ्य प्रबंधन, नवजात मेमनों की अधिकतम उत्पादकता, उनके जीवित रहने की दर और उनके वजन में वृद्धि दर पर निर्भर करता हैं ।
संलग्न दस्तावेज़: फाइल 1
