-पीयूष पुरोहित
बीकानेर। बीकानेर नगर निगम के महापौर चुनाव ने सिर्फ कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक मुकाबले को ही गरम नहीं किया है, बल्कि समाज की राजनीति और राजनीतिक दलों के प्रति सामाजिक संगठनों के रवैये को लेकर भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि अगर टिकट वितरण में समाज के किसी व्यक्ति की अनदेखी को लेकर आवाज उठाना सामाजिक अस्मिता का मुद्दा है, तो फिर यही कसौटी कांग्रेस और भाजपा दोनों पर समान रूप से क्यों नहीं लागू होती?
बीकानेर में कांग्रेस ने महापौर पद के लिए पूर्व मंत्री डॉ बीड़ी कल्ला के भतीजे अनिल कल्ला को अपना अधिकृत प्रत्याशी बनाया। इसके बाद नाराज कांग्रेस पार्षद नवरतन डागा ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में नामांकन दाखिल कर दिया था। टिकट नहीं मिलने के बाद बड़े नेताओं के दबाव में डागा के अपना नामांकन वापस ले लिया। हालाँकि डागा किसी भी राजनैतिक दबाव से इंकार कर रहे है। लेकिन महापौर की टिकट कांग्रेस से मांगने,पर्चा भरना और पर्चा वापिस लेना। बीकानेर के राजनीतिक गलियारों में इसको लेकर कई सवाल है।

