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BIKANER NEWS : कांग्रेस ने नवरतन डागा को महापौर का टिकट नहीं दिया तो वैश्य समाज चुप क्यों ?

महावीर रांका के टिकट प्रकरण में भाजपा के खिलाफ मुखरता, अब कांग्रेस के फैसले पर खामोशी क्यों? वैश्य समाज से पूछे जा रहे तीखे सवाल

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-पीयूष पुरोहित बीकानेर। बीकानेर नगर निगम के महापौर चुनाव ने सिर्फ कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक मुकाबले को ही गरम नहीं किया है, बल्कि समाज की राजनीति और राजनीतिक दलों के प्रति…

BIKANER NEWS : कांग्रेस ने नवरतन डागा को महापौर का टिकट नहीं दिया तो वैश्य समाज चुप क्यों ?

Highlights

  1. रांका के लिए आवाज और डागा के लिए खामोशी क्यों?
  2. दोनों के लिए सवाल उठाना भी उतना ही स्वाभाविक होना चाहिए था
  3. क्या वह विरोध पूरी तरह सामाजिक भावना से उपजा था?

-पीयूष पुरोहित

बीकानेर। बीकानेर नगर निगम के महापौर चुनाव ने सिर्फ कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक मुकाबले को ही गरम नहीं किया है, बल्कि समाज की राजनीति और राजनीतिक दलों के प्रति सामाजिक संगठनों के रवैये को लेकर भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि अगर टिकट वितरण में समाज के किसी व्यक्ति की अनदेखी को लेकर आवाज उठाना सामाजिक अस्मिता का मुद्दा है, तो फिर यही कसौटी कांग्रेस और भाजपा दोनों पर समान रूप से क्यों नहीं लागू होती?

बीकानेर में कांग्रेस ने महापौर पद के लिए पूर्व मंत्री डॉ बीड़ी कल्ला के भतीजे अनिल कल्ला को अपना अधिकृत प्रत्याशी बनाया। इसके बाद नाराज कांग्रेस पार्षद नवरतन डागा ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में नामांकन दाखिल कर दिया था। टिकट नहीं मिलने के बाद बड़े नेताओं के दबाव में डागा के अपना नामांकन वापस ले लिया। हालाँकि डागा किसी भी राजनैतिक दबाव से इंकार कर रहे है। लेकिन महापौर की टिकट कांग्रेस से मांगने,पर्चा भरना और पर्चा वापिस लेना। बीकानेर के राजनीतिक गलियारों में इसको लेकर कई सवाल है।

रांका के लिए आवाज और डागा के लिए खामोशी क्यों?

चुनाव के दौरान महावीर रांका से जुड़े टिकट प्रकरण के दौरान वैश्य समाज के कुछ लोगों की ओर से भाजपा के खिलाफ नाराजगी व्यक्त किए जाने और भाजपा को वोट नहीं देने की अपील किए जाने की चर्चा रही। अगर उस समय सवाल यह था कि “समाज के व्यक्ति के साथ न्याय नहीं हुआ, इसलिए समाज को आवाज उठानी चाहिए”, तो आज वही सवाल कांग्रेस से क्यों नहीं पूछा जा रहा ? क्या नवरतन डागा के मामले में सामाजिक प्रतिनिधित्व का सवाल खत्म हो जाता है ? या फिर समाज के मुद्दों की परिभाषा राजनीतिक दल देखकर बदल जाती है ? क्या समाज की नाराजगी पार्टी देखकर तय होगी ?

दोनों के लिए सवाल उठाना भी उतना ही स्वाभाविक होना चाहिए था -

बीकानेर में वैश्य समाज के महावीर रांका ने पार्षद का टिकट माँगा, बीजेपी ने नहीं दिया। वही कांग्रेस के नव निर्वाचित पार्षद नवरतन डागा, को महापौर का कैंडिडेट बनाने का भरोसा था। भरोसा टुटा। डागा ने बीकानेर में कांग्रेस पर परिवारवाद का सीधा आरोप लगाया और विरोध स्वरूप निर्दलीय नामांकन भरा। यह दीगर बात है कि पर्चा वापिस किस कारण से लिया। प्रदेश कांग्रेस से क्या आश्वासन मिला .. ।

सवाल उन अगुवा लोगों से है ,जो समाज का नेतृत्व करते है या कुछ लोगों के लिए ऐसा करते है। उन्होंने रांका के लिए फतवा जारी किया और डागा के लिए मौन क्यों साधा। दोनों वैश्य है, या फिर डागा के वैश्य होने पर उन्हें कोई शक है। खेर ये सवाल है। यदि भाजपा के टिकट वितरण को लेकर विरोध करना सामाजिक अधिकार था, तो कांग्रेस के महापौर टिकट वितरण पर सवाल उठाना भी उतना ही स्वाभाविक होना चाहिए था ।

सवाल है- क्या वैश्य समाज के लिए दोनों दलों के लिए एक ही राजनीतिक पैमाना है? या फिर भाजपा के खिलाफ बोलना आसान और कांग्रेस से सवाल पूछना कठिन है? यह सवाल किसी एक व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष का नहीं, बल्कि सामाजिक संगठनों की निष्पक्षता और राजनीतिक विश्वसनीयता का है। क्या विरोध वास्तव में सामाजिक था या राजनीतिक ?

क्या वह विरोध पूरी तरह सामाजिक भावना से उपजा था? या उसके पीछे स्थानीय राजनीति.......

क्या वह विरोध पूरी तरह सामाजिक भावना से उपजा था? या उसके पीछे स्थानीय राजनीति और अलग-अलग राजनीतिक खेमों के हित भी जुड़े हुए थे? और अलग-अलग राजनीतिक खेमों के हित भी जुड़े हुए थे? रांका से जुड़े टिकट प्रकरण के बाद समाज के नाम पर जिन लोगो ने बीजेपी को हारने का एलान किया ,उनके इस कार्य पर सवाल उठना लाजमी भी है, सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि किसी अभियान को सामाजिक आंदोलन बताया जाता है, तो उसकी कसौटी सभी राजनीतिक दलों के लिए समान होनी चाहिए।

वैश्य समाज से सीधे सवाल-अब बीकानेर के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में इन सवालों पर चर्चा होनी चाहिए।

पहला सवाल: अगर महावीर रांका को टिकट नहीं मिलने पर भाजपा से नाराजगी जायज थी, तो नवरतन डागा को कांग्रेस का टिकट नहीं मिलने पर कांग्रेस से सवाल क्यों नहीं? दूसरा सवाल: क्या सामाजिक सम्मान और प्रतिनिधित्व का मुद्दा किसी एक राजनीतिक पार्टी तक सीमित है? तीसरा सवाल: क्या समाज के लोगों के लिए राजनीतिक दल से ऊपर समाज का हित होना चाहिए? चौथा सवाल: क्या टिकट वितरण में व्यक्ति की योग्यता और राजनीतिक योगदान पर चर्चा दोनों पार्टियों में समान रूप से होनी चाहिए? पांचवां सवाल: क्या रांका प्रकरण में भाजपा को वोट नहीं देने की अपील करने वाले लोग अब कांग्रेस के फैसले पर भी सार्वजनिक रूप से अपनी राय रखेंगे ? छठा और सबसे बड़ा सवाल: अगर किसी समाज के व्यक्ति के साथ टिकट वितरण में कथित अन्याय सामाजिक मुद्दा है, तो क्या वह मुद्दा पार्टी बदलने के साथ खत्म हो जाता है?

अब जवाब की बारी किसकी ?

बीकानेर की राजनीति में सामाजिक समीकरणों की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। ऐसे में सामाजिक संगठनों और समाज के प्रभावशाली लोगों की जिम्मेदारी भी बड़ी है। यदि किसी दल के टिकट वितरण से समाज का व्यक्ति असंतुष्ट है, तो सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन वही सवाल दूसरे दल से पूछने का साहस भी होना चाहिए। महावीर रांका के मामले में अगर आवाज उठी थी तो नवरतन डागा के मामले में भी आवाज उठे—यही समानता की कसौटी है। और अगर आवाज नहीं उठती, तो फिर बीकानेर की जनता यह पूछने के लिए स्वतंत्र है— “क्या विरोध सचमुच समाज के सम्मान के लिए था, या उसके पीछे राजनीतिक गणित भी काम कर रहा था?

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