मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की डबल इंजन सरकार ने उदयपुर शहर में पेयजल, चिकित्सा व पर्यटन विकास और पर्यावरण संरक्षण के सम्बंध ऐतिहासिक कदम उठाएं हैं।
उदयपुर की दीर्घकालीन पेयजल सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में देवास परियोजना राजस्थान की महत्वपूर्ण अंतर-बेसिन जल हस्तांतरण परियोजनाओं में से एक है। देवास परियोजना के तृतीय एवं चतुर्थ चरण के लंबित कार्यों को राज्य सरकार ने सर्वोच्च प्राथमिकता पर रखते हुए तेजी से आगे बढ़ाया है। देवास परियोजना साबरमती बेसिन क्षेत्र के जल को जो व्यर्थ बहकर अरब सागर में बह जाता है, को बनास बेसिन की ओर हस्तान्तरण का अभिनव प्रयोग कर उदयपुर की जल व्यवस्था से जोड़ने की परिकल्पना का मूर्त रूप है। देवास-प्रथम से शुरू हुई इस यात्रा में वर्ष 1974 में प्रथम चरण के माध्यम से उदयपुर की पेयजल व्यवस्था को आधार मिला। इसके बाद देवास-द्वितीय वर्ष 2015 में पूर्ण हुआ, जिसके अंतर्गत आकोदड़ा बांध एवं सुरंग प्रणाली के माध्यम से गुरूत्व प्रभाव द्वारा जल को उदयपुर की पिछोला झील तक पहुंचाने की व्यवस्था विकसित हुई। देवास-तृतीय एवं देवास-चतुर्थ इसी दीर्घकालीन जल सुरक्षा की अगली महत्वपूर्ण कड़ी हैं। परियोजना पूर्ण होने पर उदयपुर शहर के लिए प्रतिवर्ष लगभग 1000 एमसीएफटी अतिरिक्त जल उपलब्ध कराया जाएगा। इससे शहर की बढ़ती पेयजल आवश्यकता को पूरा करने के साथ पिछोला एवं फतहसागर झीलों में जल स्तर बनाए रखने में भी सहायता मिलेगी।
देवास-चतुर्थ परियोजना के अंतर्गत गोगुंदा तहसील के अंबावा गांव के पास 390 एमसीएफटी क्षमता के बांध तथा 4.15 किलोमीटर लंबी टनल का निर्माण किया जा रहा है। यहां से जल का अपवर्तन देवास-तृतीय परियोजना की ओर किया जाएगा। इसी प्रकार नाथियाथल गांव के पास 703 एमसीएफटी क्षमता के देवास-तृतीय बांध का निर्माण किया जा रहा है। देवास-तृतीय बांध से जल को 10.50 किलोमीटर लंबी टनल के माध्यम से मौजूदा देवास-द्वितीय (आकोदड़ा बांध) तक तत्पश्चात् आवश्यकतानुसार उदयपुर की पिछोला झील में अपवर्तित किया जाएगा। देवास परियोजना का प्रभाव केवल पेयजल व्यवस्था तक सीमित नहीं रहेगा। उदयपुर की झीलों में बेहतर जल उपलब्धता से पर्यटन गतिविधियों, ईको टूरिज्म तथा होटल एवं पर्यटन क्षेत्र से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों को संबल मिलेगा। साथ ही जल की दीर्घकालीन उपलब्धता से स्थानीय उद्योगों तथा भविष्य में होने वाले निवेश के लिए भी अनुकूल वातावरण तैयार होगा। परियोजना से पर्यटन, पर्यावरण एवं जलीय पारिस्थितिकी के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान होगा।