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सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग का हलफनामा: SIR के तीनों आदेश सर्वसम्मति से,अनियमितताओं के आरोप खारिज

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फॉर्म-6 में बदलाव से इनकार, मतदाता सूची से नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया पर दी सफाई

सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग का हलफनामा: SIR के तीनों आदेश सर्वसम्मति से,अनियमितताओं के आरोप खारिज

Highlights

  1. ECiNET की जांच के लिए IIT और IISc के विशेषज्ञों की समिति
  2. राहुल गांधी और विपक्षी नेताओं की याचिका पर आया जवाब
  3. गोवा और पश्चिम बंगाल के मामलों पर सफाई

नई दिल्ली। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर उठे सवालों के बीच निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में जवाबी हलफनामा दाखिल कर अपनी प्रक्रिया और कार्यप्रणाली का बचाव किया है। आयोग ने अनियमितताओं के आरोपों को खारिज करते हुए याचिका के आधार और उसमें लगाए गए आरोपों पर सवाल उठाए हैं। ‘बार एंड बेंच’ की रिपोर्ट के अनुसार, आयोग ने कहा कि याचिका पूरी तरह एक समाचार रिपोर्ट पर आधारित है।

हलफनामे को मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार और निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी ने सर्वसम्मति से मंजूरी दी है। इसमें आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया, मतदाता पंजीकरण फॉर्म में कथित बदलाव, मतदाता सूची से नाम हटाने और डिजिटल मतदाता डेटाबेस से जुड़ी चिंताओं पर जवाब दिया गया है।

राहुल गांधी और विपक्षी नेताओं की याचिका पर आया जवाब

यह हलफनामा राहुल गांधी और इंडी गठबंधन के अन्य नेताओं की ओर से दायर याचिका के संदर्भ में आया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दोनों निर्वाचन आयुक्तों को नोटिस जारी किया था।

याचिकाकर्ताओं ने निर्वाचन आयोग से आधिकारिक रिकॉर्ड सार्वजनिक करने, मतदाता सूची से हटाए गए नामों की प्रक्रिया का स्वतंत्र ऑडिट कराने और हटाए गए मतदाताओं की बूथवार सूची उपलब्ध कराने की मांग की है। साथ ही, उन्होंने यह सुनिश्चित करने की मांग की है कि किसी पात्र मतदाता का नाम बिना नोटिस दिए और उसे अपना पक्ष रखने का अवसर दिए बिना मतदाता सूची से नहीं हटाया जाए।

SIR के तीनों आदेश सर्वसम्मति से मंजूर

निर्वाचन आयोग ने हलफनामे में स्पष्ट किया कि जून 2025, अक्टूबर 2025 और मई 2026 में जारी किए गए SIR संबंधी तीनों आदेश आयोग के सर्वसम्मत फैसले थे।

आयोग के अनुसार, फाइलों पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त या निर्वाचन आयुक्तों की ओर से प्रक्रिया के दौरान की गई टिप्पणियों, सवालों और सुझावों को अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता। सामान्य प्रक्रिया में फाइल पहले एक निर्वाचन आयुक्त, फिर दूसरे निर्वाचन आयुक्त और अंत में मुख्य निर्वाचन आयुक्त के पास जाती है। अत्यंत जरूरी मामलों में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से मंजूरी ली जा सकती है, जिसे बाद में आधिकारिक फाइल में दर्ज किया जाता है।

हलफनामे में यह भी कहा गया है कि यदि कोई अधिकारी अपने निर्धारित अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर आदेश जारी करता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

28 जुलाई के आदेश को लागू नहीं करने का दावा

आयोग ने 28 जुलाई को जारी कार्य-वितरण आदेश के संबंध में बताया कि यह आदेश प्रतिनियुक्ति पर आए एक अतिरिक्त सचिव ने जारी किया था। इसके अगले दिन दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को पत्र लिखा। इसके बाद 30 जुलाई को निर्वाचन आयुक्तों के संयुक्त निर्देश के बाद संबंधित आदेश को लागू नहीं किया गया।

फॉर्म-6 में संशोधन नहीं, ऑनलाइन प्रक्रिया में होगा बदलाव

मतदाता पंजीकरण फॉर्म-6 में कथित बदलाव के आरोपों पर आयोग ने कहा कि फॉर्म में कोई संशोधन नहीं किया गया है और इसमें बदलाव करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है। आयोग ने स्पष्ट किया कि SIR के लिए इस्तेमाल होने वाला घोषणा-पत्र फॉर्म-6 से अलग दस्तावेज है।

हालांकि, आयोग ने स्वीकार किया कि ऑनलाइन उपलब्ध जानकारी को फॉर्म में संशोधन के रूप में समझा जा सकता था। इस भ्रम को दूर करने के लिए 21 अक्टूबर से ऑनलाइन आवेदन की प्रक्रिया में फॉर्म-6 और घोषणा-पत्र को अलग-अलग दस्तावेजों के रूप में प्रस्तुत करने की व्यवस्था किए जाने की बात कही गई है, जैसा कि भौतिक फॉर्म में होता है।

नाम छूटने पर BLO घर जाकर लेंगे दस्तावेज

निर्वाचन आयोग ने कहा कि जिन मतदाताओं के नाम सूची में शामिल नहीं हैं, उन्हें सामान्य तौर पर सुनवाई के लिए उपस्थित होने की जरूरत नहीं होगी। बूथ लेवल अधिकारी (BLO) उनके घर जाकर आवश्यक दस्तावेज प्राप्त करेंगे। आयोग के अनुसार, सुनवाई केवल विशेष परिस्थितियों में होगी और ऐसी स्थिति में भी ऑनलाइन माध्यम को प्राथमिकता दी जाएगी।

ECINet और डिजिटल डेटा की जांच के लिए विशेषज्ञ समिति

आयोग ने स्पष्ट किया कि ECINet प्रणाली में निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO) के आदेश के बिना किसी मतदाता का नाम न तो जोड़ा जा सकता है और न ही हटाया जा सकता है। डिजिटल प्रणाली में नियमों के अनुपालन की जांच के लिए IIT और IISc के विशेषज्ञों की समिति गठित किए जाने की जानकारी भी दी गई है।

गोवा और पश्चिम बंगाल के मामलों पर सफाई

हलफनामे में गोवा की मतदाता सूची से जुड़े 97 मामलों का उल्लेख किया गया है। आयोग के अनुसार, इनमें से 88 मतदाता पहले ही पंजीकृत थे, छह विदेश में थे और तीन के पास पुर्तगाली पासपोर्ट थे।

पश्चिम बंगाल में मतदाताओं को शामिल किए जाने के खिलाफ दायर अपीलों पर आयोग ने कहा कि ये अपीलें सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के तहत राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के अधिकारियों द्वारा दायर की गई थीं। आयोग के मुताबिक, इन मामलों को उसके समक्ष नहीं लाया गया था।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की मांग पर भी जवाब

निर्वाचन आयोग ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त को रोकने या उनके कामकाज पर प्रतिबंध लगाने की मांग वाली याचिका को कानूनी रूप से अमान्य बताया। आयोग ने कहा कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया वही है, जो सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश को पद से हटाने के लिए निर्धारित है।

आयोग ने यह भी कहा कि उसने कभी कोई आंतरिक नोट या आधिकारिक फाइल मीडिया में जारी नहीं की और न ही ऐसा करने की अनुमति दी है। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) को लेकर उठाए गए सवालों के संबंध में आयोग ने दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही ऐसे सवालों को खारिज कर चुका है।

अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की आगे की सुनवाई महत्वपूर्ण होगी। याचिकाकर्ताओं की मांग मतदाता सूची की पारदर्शिता, नाम हटाने की प्रक्रिया और पात्र मतदाताओं के अधिकारों से जुड़ी है, जबकि निर्वाचन आयोग ने अपने हलफनामे में मौजूदा प्रक्रिया का बचाव किया है।

Source: NSI MEDIA

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