कोटा के युवा चित्रकार अंकित बनवाड़िया ने मांडणा कला को बचाने के लिए पारंपरिक सामग्री और जनजागरूकता पर जोर दिया। वह इस प्राचीन लोक कला को आधुनिक जीवनशैली में भी जीवित रखने की कोशिश कर रहे हैं।
उनके अनुसार, मांडणा केवल सजावट नहीं, बल्कि प्रकृति से जुड़ी गहरी परम्परा है। वह बताते हैं कि पारम्परिक रूप से गोबर और चूने जैसी प्राकृतिक चीज़ों का उपयोग किया जाता है, जिनमें एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं।
परम्परा और बदलाव
पहले लोग दिवाली और अन्य त्यौहारों पर कच्चे मकानों में स्वास्तिक, माताजी के पगले जैसे शुभ प्रतीक उकेरते थे। आज के तेज़‑रफ़्तार जीवन में लोग रेडी‑मेड रंगोलियों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिनमें केमिकल्स होते हैं और वे परम्परागत मांडणों जितनी आकर्षक नहीं लगतीं।
