उत्तर प्रदेश एक ऐसे मुख्यमंत्री से रूबरू है, जिसे राजनीति के मैदान में बहुत गंभीरता से नहीं लिया जा रहा था। उनके बारे में यह ख्यात था कि वे एक खास वर्ग की राजनीति करते हैं और भारतीय जनता पार्टी भी उनकी राजनीतिक शैली से पूरी तरह सहमत नहीं है। लेकिन उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ ने जिस तरह अपनी पकड़ बनाई है और देश में एक अलग माडल खड़ा दिया है, वह सर्वत्र चर्चा का विषय है। इससे यह भी साबित हो रहा है कि ‘अपनी राजनीति’ के प्रति भाजपा का आत्मदैन्य कम हो रहा है। वहीं असम में हेमंत विश्वशर्मा उम्मीदों का चेहरा बनकर उभरे हैं, असम में तीसरी बार सरकार बनाकर भाजपा ने पूर्वोत्तर में इतिहास रच दिया है।
इसी तरह गृहमंत्री अमित शाह की रणनीति से पश्चिम बंगाल की विजय ऐतिहासिक कही जा रही है और वहां बने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के ताबड़तोड़ फैसलों ने जनविश्वास की हिलोरें पैदा की हैं। जड़ता को तोड़कर एक नई उम्मीद बनी है। केंद्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी और अमित शाह के आगमन ने भारतीय राजनीति के परिदृश्य को बदलकर रख दिया है।
वैचारिक हीनग्रंथि से बाहर आई भाजपा-
भाजपा का आज तक का ट्रैक हिंदुत्व का वैचारिक और राजनीतिक इस्तेमाल कर सत्ता में आने का रहा है। देश की राजनीति में चल रहे विमर्श में भाजपा बड़ी चतुराई से इस कार्ड का इस्तेमाल तो करती थी, किंतु उसके नेतृत्व में इसे लेकर एक हिचक बनी रहती थी। वो हिचक अटल जी से लेकर आडवानी तक हर दौर में दिखी है। भाजपा का हर नेता सत्ता पाने के बाद यह साबित करने में लगा रहता है वह अन्य दलों के नेताओं के कम ‘सेकुलर’ नहीं है।