केन्द्रीय पर्यावरण , वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ( एमओईएफसीसी ) 29-30 अक्टूबर , 2026 को नई दिल्ली में ‘ ऐनहेंसिंग कोस्टल रीजीलिएंस थ्रू अडेप्टिव स्ट्रेटेजीज ’ विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित कर रहा है। यह कार्यशाला हरित जलवायु कोष ( जीसीएफ ) की परियोजना ‘ भारत के तटीय समुदायों की जलवायु अनुकूलन क्षमता को बढ़ाना’ ( जीसीएफ-ईसीआरआईसीसी ) के तहत आयोजित की जा रही है। इस परियोजना का उद्देश्य अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों की आजीविका में सुधार लाने के साथ-साथ मैंग्रोव , तटीय जलग्रहण क्षेत्रों , समुद्री घास , लवणीय दलदली क्षेत्रों और प्रवाल भित्तियों सहित महत्वपूर्ण तटीय इकोसिस्टम को बहाल करना है।
उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए पर्यावरण , वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सचिव श्री नरेन्द्र भूषण ने इस बात पर जोर दिया कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की विकसित भारत 2047 की कल्पना को साकार करने के लिए आजीविका की सुरक्षा के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति तटीय समुदायों की तूफान जैसी प्रतिकूल परिस्थितियों से मुकाबला करने की क्षमता को मजबूत करना अनिवार्य है। उन्होंने तटीय क्षेत्रों के लिए जलवायु संबंधी जोखिमों का समाधान करने की आवश्यकता पर बल दिया और जैव विविधता , आजीविका तथा तटीय संरक्षण के लिए मैंग्रोव , समुद्री घास , लवणीय दलदली क्षेत्रों और प्रवाल भित्तियों के महत्व को रेखांकित किया।
सचिव ने इस बात पर जोर दिया कि भारत ने तटरेखा में बदलाव के आकलन , खतरे की रेखा के मानचित्रण , तटीय संवेदनशीलता के आकलन और इकोसिस्टम संबंधी जानकारी के माध्यम से तटीय नियोजन के वैज्ञानिक आधार को काफी मजबूत किया है। उन्होंने कहा कि अब अगला कार्य यह सुनिश्चित करना है कि यह साक्ष्य रिपोर्टों और मानचित्रों तक सीमित न रहे , बल्कि राज्य , जिला और स्थानीय स्तर पर वास्तविक नियोजन , बुनियादी ढांचे और निवेश संबंधी निर्णयों में भी इसका उपयोग हो। श्री भूषण ने जानकारी दी कि राष्ट्रीय तटीय मिशन , जीसीएफ-ईसीआरआईसीसी परियोजना के परिणामों के आधार पर तटीय लचीलेपन और अनुकूलन संबंधी पहलों के निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाएगा।
